उपन्यास समीक्षा

“कंकाल”

 

शीर्षक :-

जय शंकर प्रसाद द्वारा रचित यह उपन्यास “कंकाल” एक कालजयी उपन्यास है, जो इसके शीर्षक “कंकाल’  को बहुत ही सार्थक रूप में सटीक स्पष्ट करता है |

उपन्यास में इस शीर्षक के अंत में इसका शीर्षक कंकाल दिए जाने का पता चलता है | जब इस उपन्यास को पढना प्रारंभ करते हैं तो एक के बाद एक चरित्र आपके सामने आकर आपको बांधे रखते हैं ,जब तक आप इस को पूरा न पढ़ लें तब तक इस शीर्षक “कंकाल” का अर्थ नहीं समझ पाएंगे |

कथावस्तु :-

प्रयाग में एक व्यापारी श्रीचंद एवं उसकी पत्नी किशोरी संतान की इच्छा लिए एक महात्मा से मिलने आते हैं, महात्मा किशोरी को देखकर अचम्भित हो  जाता है और अपने को सँभालते हुए वहां से हरिद्वार चला जाता है यहाँ पर भी किशोरी आ जाती है जो कोई और नहीं वरन उसकी बचपन की सखी है ,महात्मा उसे अपना परिचय देते हुए बताता है कि वह उसका बचपन का साथी रंजन है और अब वह निरंजन हो गया है | किशोरी को वही पर छोड़ कर उसका पति उसे छोड़कर व्यापार को निकल जाता है यहाँ पर किशोरी के साथ उसका नौकर बलदाऊ रहता है जो कही से एक विधवा को लाकर किशोरी से मिलवाता है ,किशोरी को लेने वापस श्रीचंद आता है ,विधवा जिसका नाम रामा था यही हरिद्वार में रूक जाती है ,इसी बीच देवनिरंजन और किशोरी का मिलाप हो चूका होता है | विधवा रामा भी सधवा होकर भंडारी से विवाह कर लेती है \ इस प्रकार 15 वर्ष बीत जाते हैं रामा के एक सुन्दर कन्या होती है जिसका नाम तारा है हरिद्वार में ग्रहण के दिन स्नान करने के लिए रामा का पूरा परिवार आता है , उस भीड़ में तारा अपनी माँ रामा से बिछड़ जाती है और एक स्वयं सेवक उससे रोने का कारण पूछता है पर तभी एक बच्चा बेचने वाली उसे बहला फुसलाकर ले जाती है और उसे लखनऊ जा कर एक कोठे पर बेच देती यहाँ पर अब यही तारा को नया नाम गुलेनार मिलता है | एक दिन वही स्वयं सेवक जो हरिद्वार में मिला था अपने दोस्तों के साथ किसी काम से आता है और उसका दोस्त वीरेंद्र उसे कोठे पर जाने की जिद करता है और ये दोनों उसी कोठे पर पहुँचते हैं जहाँ गुलनार बनी तारा से स्वयं सेवक जिसका नाम मंगल है मुलाकात होती है ,यही पर मंगल उस लड़की को कोठे से बचाने का सोचता है और कुछ ही दिनों में वह सफल भी हो जाता है |

हरिद्वार जाते समय ट्रेन में तारा के पिता से  तारा की मुलाकात होती है पर उसके पिता द्वारा तिरस्कार कर दिया जाता है | हरिद्वार आकर वह अब मंगल के साथ ही समय बिता रही होती है इसी बीच मंगल और तारा के बीच बिन शादी के ही अन्तरंग सम्बन्ध बन जाते हैं ,पड़ोस में रहने वाली महिला तारा को मंगल से शादी करने का कहती है ,शादी के दिन मंगल लोक लाज के डर से तारा को छोड़ कर भाग जाता है | उधर तारा मंगल का इंतजार करती और इसी बीच तारा एक बच्चे को जन्म देती है और उसको छोड़कर चली जाती | उधर किशोरी को श्रीचंद ले जाता है है उसे भी छः माह बाद एक बच्चा होता है जिससे श्रीचंद नाराज हो जाता है और उसे वापस देवनिरंजन के पास छोड़ देता है |

धीरे धीरे समय बीतता है और किशोरी का लड़का बड़ा हो जाता है जिसका नाम विजय है ,एक दिन बाजार में विजय का किसी से झगडा होत्ता है यहाँ पर मंगल उसे बचाता है और अपने साथ मंगल को घर ले आता है | निरंजन के आश्रम में कोई कार्यक्रम होता है वहा पे भूखी प्यासी  तारा आती है किशोरी दया करके उसे अपने पास ही रख लेती है जो आगे चल कर विजय की देख भाल करती है मगर वह मंगल से छुप के रहती है उसे पता नहीं चलने देती है की वह वही तारा है जिसको वह शादी वाले दिन छोड़ कर भाग जाता है | इसी बीच तारा और मंगल की मुलाकात हो जाती है तारा जो यमुना के नाम से विजय के यहाँ रह रही होती है ,उनके इस सम्बन्ध के बारे में जानकर विजय को बहुत दुःख पहुँचता है और वह बीमार हो जाता है ,करीब 8 दिनों के बाद वह उठता है वह मन ही मन उसको चाहने लगता है |

समय बीतता है मंगल कही जाकर एक स्कूल खोल लेता है वही पर वृन्दावन में विजय को एक अल्हड लड़की मिलती है घंटी जो मद मस्त घुमती है हंसती है ,विजय के दिन अब उसी के साथ बीतते हैं ये सब यमुना (तारा) देखती है विजय की माँ किशोरी को ये सब पसंद नहीं होता है ,मंगल एक आश्रम वृन्दावन में खोल लेता है जिसमे 8-10 लड़के पढ़ते हैं ,किशोरी और निरंजन तीर्थ यात्रा पर चले जाते हैं ,केवल विजय और यमुना अकेले रहते हैं बीच बीच में घंटी आती रहती है एक दिन घंटी यमुना को मंगल के आश्रम ले कर जाती है ,पीछे पीछे विजय भी आता है उसे अच्छा नहीं लगता और वह हारमोनियम ले कर शराब पीने का अदि हो जाता है और घंटी के रंग में रंग जाता है | किशोरी और निरंजन वापस आते हैं विजय को घंटी के साथ देख कर विजय और किशोरी में झगडा हो जाता है किशोरी विजय को वापस काशी ले जाना चाहती है पर विजय नहीं जाता है ,कुछ दी के बाद विजय और घंटी किसी मुसीबत में फंस जाते है जिसे एक बाथम नाम के क्रिस्चन उन्हें बचाते हैं यहाँ पर लतिका जो की बाथम की पत्नी है और सरला नाम की बुजुर्ग महिला काम करती हैं जिसमे सरला विजय कि एक बेटे की तरह देख भाल करती है| वही पर एक बूढ़ा आदमी आता है सरला उसे देख कर बताती है कि इसने मेरा बच्चा छीन लिया है और कही पर ले गया है बूढ़ा आदमी, बूढ़ा आदमी कहानी सुनाता है की कैसे उसने सरला का लड़का किसी लड़की से बदल दिया था और वह लड़की किसी गोविन्द चौबयीन के गोद में पली बढ़ी तभी घंटी कहती है की गोविन्द चौबयीन ही उसकी माँ है , बूढ़ा बताता है की वह औरत जिसको लड़का दिया था वह उसको वापस कर जाती है और उसे एक अनाथालय में छोड़ देता है उसके गले में एक खानदानी कवच रहता है | वही पर बाथम की बुरी नजर घंटी पर पड़ती है जो उसे अपनी हीरे की अंगूठी दे देता है बाथम की पत्नी लतिका उस अंगूठी को देख कर क्रिधित हो जाती है ,घंटी विजय से वहां से चलने का कहती है , वही पर एक तांगे वाली की नजर भी घंटी पर [पढ़ती है  वह दरोगा से मिल कर उसे पाने का जातां करता है  | उधर यमुना एक महात्मा के आश्रम में सेवा करती है वही पर कुछ समय बाद मंगल भी उसी आश्रम में सेवा करने आता है यमुना को देख कर चौंक जाता है दोनों के मन में दबा प्यार पुनः हिलोरे मरने लगता है | एक दिन विजय और घंटी गोस्वामी जी के प्रवचन सुनने जाते है ,इधर लतिका दुःख संताप करती है की बाथम ने ऐसी हरकत की सरला उसे विजय और घंटी को वहां से बिदा करवाने का कहती है ,विजय घंटी के साथ गोस्वामी के आश्रम में विवाह करना चाहता है मगर यमुना उसे ऐसा करने से रोक देती है | उधर श्रीचंद व्यापर में मस्त एक चंदा नाम की औरत के साथ जीवन बिता रहा है उसका व्यापर ठप्प हो जाता है तो वो किशोरी के पास जाने का सोचता है | उधर किशोरी और निरंजन वापस वृन्दावन आते है किशोरी निरंजन को विजय को ढूँढने निकल जाता है और तभी श्रीचंद एक लड़की के साथ किशोरी के पास आता है और बताता है कि उसका व्यापर ठप्प हो गया है ये उसके किसी परिचित की विधवा लड़की है और किशोरी के साथ अतिथि बनकर वहीँ रहने लगता है | उधर निरंजन हरिद्वार से भंडारी को बुला कर विजय की खोज करता है |

विजय ,घंटी गंगा में नाव में विचरण करते है सुबह होने पर जब किनारे पर लघु शंका करने जाते हैं वही तांगे वाला नवाब घंटी को पकड़ लेता है विजय और नवाब में झड़प होती है और विजय पत्थर से कुचलकर उसकी हत्या कर देता है तभी यमुना आकर उसे वहां से घंटी को लेकर जाने को कहती है विजय घंटी को लेकर वहां से चला जाता है पुलिस आती है यमुना से पूछती है तो अह कहती है की किसी महिला के चरित्र का हरण करने के कारण उसकी हत्या हो गयी|

इधर फ़तेह पुर सीकरी में एक नयी कहानी चलती है जिसमे एक बूढ़ा पूर्व डाकू बदन रहता है उसकी एक लड़की गालाहोती है यही पर जंगल में एक नवयुवक नए (विजय) मिलता है ,यही पर मंगल भी एक छोटे से स्थान में पाठशाला खोलता है गाला की कहानी बीच बीच में चलती है ,गाला, नए से विवाह करनी चाहती है पर बदन को पसंद  नहीं होता है वह गाला को घरसे निकल देता है ,गाला मंगल के स्कूल में जाकर रहने लगती है | एक लड़का श्रीचाँद के संपर्क में आता है जिसका नाम मोहन है समय बीतता है इधर मंगल की पाठशाला अची चलने लगती है ,नंदा जो की घंटी असली माँ है पता चलता है की किशोरी घंटी से नाराज हो जाती है कहती है की उसने उसके पुत्र को खा गयी ,मंगल को गोस्वामी जी द्वारा बुलाया जाता है पता चलता है की किसी महिला पर महाभियोग चल रहा है उसे बचानेके प्रयास करना है | नन्दा और घंटी ट्रेन से वापस वृन्दावन आते हैं, वहां पर पुनः बाथम मिल जाता है और घंटी पर अपना अधिकार जमाते हुए कहता है कि ये मेरी पत्नी है ,नंदा इसका विरोध करती है ,यहाँ पर मंगल आकर उसके चंगुल से बचाता है | गोस्वामी जी के साथ मिलकर वह भारत संघ संस्था का निर्माण करता है जो की हिन्दू विचार धारा को बचाना जिसका उद्देश्य होता है | अचानक ही मंगल की तबियत अचानक ख़राब हो जाती है इससे पहले गाला को पता चलता है की गाला के पिता का स्वास्थ्य भी ख़राब है ,गाला अपने पिता का अंतिम संस्कार करके सरला और गाला मंगल की सेवा करते हैं , सरला इश्वर से प्रार्थना करने गंगा तट पर जाती है यहाँ भिखारी वेश में एक आदमी मिलता है जो सरला को एक कवच देता है जिससे सरला को पता चलता है की मंगल ही उसका खोया हुआ लड़का है ,इतने समय में श्रीचंद मोहन को अपना दत्तक पुत्र बना लेता है जिससे किशोरी को बहतु धक्का लगता है  और वह मरणासनअवस्था में पहुँच जाती है ,यमुना विजय के पास जाकर बताती है की किशोरी उसकी माँ का अंत समय है जाकर मिल लो श्रीचंद इस उपलक्ष्य में दान पुन्य कर रहा है ,विजय माँ के अंत समय में मिल कर दुखी होता है और मन पर गंभीर असर होता है और  गली में कहीं चला जाता है और मर जाता है यमुना आती है उसे देखती है और रोती है उसी समय मंगल के संघ की यात्रा निकल रही होती है यमुना उसको बताती है की कोई भिखारी मर गया है मंगल ध्यान नहीं देता है ,यमुना जाकर श्रीचंद से 10 रूपए की मांग करती है और उसके कुछ स्वयं सेवकों को 10 रूपए देकर उस कंकाल बने विजय का अंतिम संस्कार करवाती है |

 

 

 

चरित्र चित्रण :-

श्रीचंद – एक व्यापारी किशोरी का पति |

किशोरी – श्रीचंद की पत्नी, निरंजन की बचपन सखी ,विजय की माँ |

देव निरंजन – एक साधू जो की किशोरी का बचपन का दोस्त था |

रामा- बरेली की एक ब्राह्मण विधवा बहु |

तारा (गुलनार,यमुना) – रामा की लड़की |

मंगल – एक स्वयं सेवक ,सरला का खोया हुआ बेटा |

वीरेंद्र – मंगल का मित्र |

विजय (नए) – किशोरी निरंजन का पुत्र|

घंटी – ब्रज में रहने वाली लड़की |

बाथम- एक ईसाई |

लतिका (मार्गरेट) – बाथम की पत्नी |

गाला – बदन दस्यु की बेटी |

बदन – एक पूर्व बूढ़ा दस्यु |

संवाद :-

'हम लोग अमृतसर के रहने वाले हैं, मेरा नाम श्रीचन्द्र है और यह मेरी धर्मपत्नी है।' कहकर श्रीचन्द्र ने युवती की ओर संकेत किया। महात्मा ने भी उसकी ओर देखा। युवती ने उस दृष्टि से यह अर्थ निकाला कि महात्मा जी मेरा भी नाम पूछ रहे हैं। वह जैसे किसी पुरस्कार पाने की प्रत्याशा और लालच से प्रेरित होकर बोल उठी, 'दासी का नाम किशोरी है।'

किशोरी ने हाथ जोड़कर कहा, 'महाराज, मेरे ऊपर दया न होगी?'

वीरेन्द्र-'मंगल, आज तुमको मेरी एक बात माननी होगी!'

मंगल-'क्या बात है, पहले सुनूँ भी।'

वीरेन्द्र-'नहीं, पहले तुम स्वीकार करो।'

मंगल-'यह नहीं हो सकता; क्योंकि फिर उसे न करने से मुझे कष्ट होगा।'

वीरेन्द्र-'बहुत बुरी बात है; परन्तु मेरी मित्रता के नाते तुम्हें करना ही होगा।'

मंगल-'यही तो ठीक नहीं।'

वीरेन्द्र-'अवश्य ठीक नहीं, तो भी तुम्हें मानना होगा।'

मंगल-'वीरेन्द्र, ऐसा अनुरोध न करो।'

वीरेन्द्र-'यह मेरा हठ है और तुम जानते हो कि मेरा कोई भी विनोद तुम्हारे बिना असम्भव है, निस्सार है। देखो, तुमसे स्पष्ट करता हूँ। उधर देखो-वह एक बाल वेश्या है, मैं उसके पास जाकर एक बार केवल नयनाभिराम रूप देखना चाहता हूँ। इससे विशेष कुछ नहीं।'

मंगल-'यह कैसा कुतूहल! छिः!'

निरंजन ने कहा, 'किशोरी, तुम मुझको पहचानती हो?'

मंगल ने कहा, 'उसकी आवश्यकता नहीं, मैं तो केवल अपना कुतूहल मिटाने आया हूँ-क्या सचमुच तुम वही हो, जिसे मैंने ग्रहण की रात काशी में देखा था?'

'जब आपको केवल पूछना ही है तो मैं क्यो बताऊँ जब आप जान जायेंगे कि मैं वही हूँ, तो फिर आपको आने की आवश्यकता ही न रह जायेगी।'

मंगल ने सोचा, संसार कितनी शीघ्रता से मनुष्य को चतुर बना देता है। 'अब तो पूछने का काम ही नहीं है।'

'क्यों?'

'आवश्यकता ने सब परदा खोल दिया, तुम मुसलमानी कदापि नहीं हो।'

'परन्तु मैं मुसलमानी हूँ।'

'हाँ, यही तो एक भयानक बात है।'

'और यदि न होऊँ

'तब की बात तो दूसरी है।'

'अच्छा तो मैं वहीं हूँ, जिसका आपको भ्रम है।'

'तुम किस प्रकार यहाँ आ गयी हो

'वह बड़ी कथा है।' यह कहकर गुलेनार ने लम्बी साँस ली, उसकी आँखें आँसू से भर गयीं।

'क्या मैं सुन सकता हूँ

'क्यों नहीं, पर सुनकर क्या कीजियेगा। अब इतना ही समझ लीजिये कि मैं एक मुसलमानी वेश्या हूँ।'

'नहीं गुलेनार, तुम्हारा नाम क्या है, सच-सच बताओ।'

'मेरा नाम तारा है। मैं हरिद्वार की रहने वाली हूँ। अपने पिता के साथ काशी में ग्रहण नहाने गयी थी। बड़ी कठिनता से मेरा विवाह ठीक हो गया था। काशी से लौटते हुए मैं एक कुल की स्वामिनी बनती; परन्तु दुर्भाग्य...!' उसकी भरी आँखों से आँसू गिरने लगे।

'बाबू जी, मेरा क्या अपराध है मैं तो आप लोगों को खोज रही थी।'

'अभागिनी! खोज रही थी मुझे या किसी और को?'

'किसको बाबूजी बिलखते हुए तारा ने कहा।

'जो पास में बैठा है। मुझे खोजना चाहती है, तो एक पोस्टकार्ड न डाल देती कलंकिनी, दुष्ट! मुझे जल पिला दिया, प्रायश्चित्त करना पड़ेगा!'

ज्ञानदत्त-'इसलिए आर्यों का कर्मवाद संसार के लिए विलक्षण कल्याणदायक है-ईश्वर के प्रति विश्वास करते हुए भी स्वावलम्बन का पाठ पढ़ाता है। यह ऋषियों का दिव्य अनुसंधान है।'

ब्रह्मचारी ने कहा, 'तो अब क्या विलम्ब है, बातें भी चला करेंगी।'

मंगलदेव ने कहा, 'हाँ, हाँ आरम्भ कीजिये।'

ब्रह्मचारी ने गंभीर स्वर में प्रणवाद किया और दन्त-अन्न का युद्ध प्रारम्भ हुआ।

मंगलदेव ने कहा, 'परन्तु संसार की अभाव-आवश्यकताओं को देखकर यह कहना पड़ता है कि कर्मवाद का सृजन करके हिन्दू-जाति ने अपने लिए असंतोष और दौड़-धूप, आशा और संकल्प का फन्दा बना लिया है।'

'कदापि नहीं, ऐसा समझना भ्रम है महाशयजी! मनुष्यों को पाप-पुण्य की सीमा में रखने के लिए इससे बढ़कर कोई उपाय जाग्रत नहीं मिला।'

सुभद्रा ने कहा।

'मेरा मन भी उचाट हो रहा है। इच्छा होती है कि कहीं घूम आऊँ; परन्तु तुम्हारा ब्याह हुए बिना मैं कहीं नहीं जा सकता।'

'मैं तो ब्याह न करूँगी।'

'क्यों?'

'दिन तो बिताना ही है, कहीं नौकरी कर लूँगी। ब्याह करने की क्या आवश्यकता है?'

'नहीं तारा, यह नहीं हो सकता। तुम्हारा निश्चित लक्ष्य बनाये बिना कर्तव्य मुझे धिक्कार देगा।'

'मेरा लक्ष्य क्या है, अभी मैं स्वयं स्थिर नहीं कर सकी।'

'मैं स्थिर करूँगा।'

'क्यों ये भार अपने ऊपर लेते हो मुझे अपनी धारा में बहने दो।'

'सो नहीं हो सकेगा।'

'मैं कभी-कभी विचारती हूँ कि छायाचित्र-सदृश जलस्रोत में नियति पवन के थपेड़े लगा रही है, वह तरंग-संकुल होकर घूम रहा है। और मैं एक तिनके के सदृश उसी में इधर-उधर बह रही हूँ। कभी भँवर में चक्कर खाती हूँ, कभी लहरों में नीचे-ऊपर होती हूँ। कहीं कूल-किनारा नहीं।' कहते-कहते तारा की आँखें छलछला

अँधेरा हो चला था। चाची अभी-अभी घूमकर बाहर से आयी थी। तारा के पास आकर बैठ गयी। पूछा, 'तारा, कैसी हो?'

'क्या बताऊँ चाची, कैसी हूँ! भगवान जानते हैं, कैसी बीत रही है!'

'यह सब तुम्हारी चाल से हुआ।'

'सो तो ठीक कह रही हो।'

'नहीं, बुरा न मानना। देखो यदि मुझे पहले ही तुम अपना हाल कह देतीं, तो मैं ऐसा उपाय कर देती कि यह सब विपत्ति ही न आने पाती।'

'कौन उपाय चाची?'

'वही जब दो महीने का था, उसका प्रबन्ध हो जाता। किसी को कानो-कान खबर भी न होती। फिर तुम और मंगल एक बने रहते।'

'पर क्या इसी के लिए मंगल भाग गया? कदापि नहीं, उसके मन से मेरा प्रेम ही चला गया। चाची, जो बिना किसी लोभ के मेरी इतनी सहायता करता था, वह मुझे इस निस्सहाय अवस्था में इसलिए छोड़कर कभी नहीं जाता। इसमें काई दूसरा ही कारण है।'

'यह कोई अच्छी बात तो नहीं है बहूजी।'

'क्या करूँ यमुना, विजय अभी लड़का है, मानता नहीं। धीरे-धीरे समझ जायेगा।' अप्रतिम होकर किशोरी ने कहा।

इतने में एक सुन्दर तरुण बालिका अपना हँसता हुआ मुख लिए भीतर आते ही बोली, 'किशोरी बहू, शाहजी के मन्दिर में आरती देखने चलोगी न?'

'तू आ गयी घण्टी! मैं तेरी प्रतीक्षा में ही थी।'

'तो फिर विलम्ब क्यों कहते हुए घण्टी ने अल्हड़पन से विजय की ओर देखा।

किशोरी ने कहा, 'विजय तू भी चलेगा न?'

'यमुना और विजय को यहीं झाँकी मिलती है, क्यों विजय बाबू?' बात काटते हुए घण्टी ने कहा।

'मैं तो जाऊँगा नहीं, क्योंकि छः बजे मुझे एक मित्र से मिलने जाना है; परन्तु घण्टी, तुम तो हो बड़ी नटखट!' विजय ने कहा।

'यह ब्रज है बाबूजी! यहाँ के पत्ते-पत्ते में प्रेम भरा है। बंसी वाले की बंसी अब भी सेवा-कुंज में आधी रात को बजती है। चिंता किस बात की?'

विजय ने कहा, 'मैं नही जाऊँगा।'

'तू सब बातों में आड़े आ जाता है।'

'वह कोई आवश्यक बात नहीं कि मैं भी पुण्य-संचय करूँ।' विरक्त होकर विजय ने कहा, 'यदि इच्छा हो तो आप चली जा सकती हैं, मैं तब तक यहीं बैठा रहूँगा।'

'तो क्या तू यहाँ अकेला रहेगा?'

'नहीं, मंगल के आश्रम में जा रहूँगा। वहाँ मकान बन रहा है, उसे भी देखूँगा, कुछ सहायता भी करूँगा और मन भी बहलेगा।'

'वह आप ही दरिद्र है, तू उसके यहाँ जाकर उसे और भी दुख देगा।'

'तो मैं क्या उसके सिर पर रहूँगा।'

'यमुना! तू चलेगी?'

'फिर विजय बाबू को खिलावेगा कौन बहू जी, मैं तो चलने के लिए प्रस्तुत हूँ।'

अँधेरा हो गया था, वह कदम्ब के नीचे बैठा हारमोनियम बजा रहा था। चंचल घण्टी चली आयी। उसने कहा, 'बाबूजी आप तो बड़ा अच्छा हारमोनियम बजाते है।' पास ही बैठ गयी।

'तुम कुछ गाना जानती हो?'

'ब्रजवासिनी और कुछ चाहे ना जाने, किन्तु फाग गाना तो उसी के हिस्से का है।'

'अच्छा तो कुछ गाओ, देखूँ मैं बजा सकता हूँ

ब्रजबाला घण्टी एक गीत सुनाने लगी-

'पिया के हिया में परी है गाँठ

मैं कौन जतन से खोलूँ

सब सखियाँ मिलि फाग मनावत

मै बावरी-सी डोलूँ!

अब की फागुन पिया भये निरमोहिया

मैं बैठी विष घोलूँ।

पिया के-'

विजय ने कहा, 'तुम्हें बड़ा कष्ट हुआ, घण्टी!'

घण्टी ने कहा, 'आशा है, अब कष्ट न दोगे!'

पीछे से बाथम ने प्रवेश करते हुए कहा, 'विजय बाबू, बहुत सुन्दर 'मॉडल' है। देखिये, यदि आप नादिरशाह का चित्र पूरा कर चुके हो तो एक मौलिक चित्र बनाइये।'

विजय ने देखा, यह सत्य है। एक कुशल शिल्पी की बनायी हुई प्रतिमा-घण्टी खड़ी रही। बाथम चित्र देखने लगा। फिर दोनों चित्रों को मिलाकर देखा। उसने सहसा कहा, 'आश्चर्य! इस सफलता के लिए बधाई।'

श्रीचन्द्र उसकी सौन्दर्य-छटा देखकर पल-भर के लिए धन-चिंता-विस्मृत हो गया। हृदय एक बार नाच उठा। वह उठ बैठा। चन्दा ने सामने बैठकर उसकी भूख लगा दी। ब्यालू करते-करते श्रीचन्द्र ने कहा, 'चन्दा, तुम मेरे लिए इतना कष्ट करती हो।'

चन्दा-'और तुमको इस कष्ट में चिंता क्यों है?'

श्रीचन्द्र-'यही कि मैं इसका क्या प्रतिकार कर सकूँगा!'

चन्दा-'प्रतिकार मैं स्वयं कर लूँगी। हाँ, पहले यह तो बताओ-अब तुम्हारे ऊपर कितना ऋण है?'

श्रीचन्द्र-'अभी बहुत है।'

चन्दा-'क्या कहा! अभी बहुत है।'

श्रीचन्द्र-'हाँ, अमृतसर की सारी स्थावर सम्पत्ति अभी बन्धक है। एक लाख रुपया चाहिए।'

'हाँ, मैंने जब संसार छोड़ दिया है, तब किसी की बात क्यों सहूँ?'

'क्यों झूठ बोलते हो, तुमने कब कोई वस्तु छोड़ी थी। तुम्हारे त्याग से तो भोले-भाले, माया में फँसे हुए गृहस्थ कहीं ऊँचे हैं! अपनी ओर देखो, हृदय पर हाथ रखकर पूछो, निरंजन, मेरे सामने तुम यह कह सकते हो संसार आज तुमको और मुझको क्या समझता है-इसका भी समाचार जानते हो?'

'जानता हूँ किशोरी! माया के साधारण झटके में एक सच्चे साधु के फँस जाने, ठग जाने का यह लज्जित प्रसंग अब किसी से छिपा नहीं-इसलिए मैं जाना चाहता हूँ।'

'तो रोकता कौन है, जाओ! परन्तु जिसके लिए मैंने सबकुछ खो दिया है, उसे तुम्हीं ने मुझसे छीन लिया-उसे देकर जाओ! जाओ तपस्या करो, तुम फिर महात्मा बन जाओगे! सुना है, पुरुषों के तप करने से घोर-से-घोर कुकर्मों को भी भगवान् क्षमा करके उन्हें दर्शन देते हैं; पर मैं हूँ स्त्री जाति! मेरा यह भाग्य नहीं, मैंने पाप करके जो पाप बटोरा है, उसे ही मेरी गोद में फेंकते जाओ!'

'कुछ नहीं, फाँसी होगी और क्या!' निर्भीक भाव से विजय ने कहा।

'आप इन्हें अपनी नाव दे दें और ये जहाँ तक जा सकें, निकल जायें। इनका यहाँ ठहरना ठीक नहीं।' स्त्री ने निरंजन से कहा।

'नहीं यमुना! तुम अब इस जीवन को बचाने की चिंता न करो, मैं इतना कायर नहीं हूँ।' विजय ने कहा।

'परन्तु तुम्हारी माता क्या कहेगीं विजय! मेरी बात मानो, तुम इस समय तो हट ही जाओ, फिर देखा जायेगा। मैं भी कह रहा हूँ, यमुना की भी यही सम्मति है। एक क्षण में मृत्यु की विभीषिका नाचने लगी! लड़कपन न करो, भागो!' निरंजन ने कहा।

विजय को सोचते-विचारते और विलम्ब करते देखकर यमुना ने बिगड़कर कहा, 'विजय बाबू! प्रत्येक अवसर पर लड़कपन अच्छा नहीं लगता। मैं कहती हूँ, आप अभी-अभी चले जायें! आह! आप सुनते नही?'

विजय ने सुना, अच्छा नहीं लगता! ऊँह, यह तो बुरी बात है। हाँ ठीक, तो देखा जायेगा। जीवन सहज में दे देने की वस्तु नहीं। और तिस पर भी यमुना कहती है-ठीक उसी तरह जैसे पहले दो खिल्ली पान और खा लेने के लिए, उसने कई बार डाँटने के स्वर में अनुरोध किया था! तो फिर!...

कुछ समय बीतने पर पुलिस ने आकर यमुना से पूछना आरम्भ किया, 'तुम्हारा नाम क्या है?'

'यमुना!'

'यह कैसे मरा

'इसने एक स्त्री पर अत्याचार करना चाहा था।'

'फिर

'फिर यह मारा गया।'

'किसने मारा

'जिसका इसने अपराध किया।'

'तो वह स्त्री तुम्हीं तो नहीं हो?'

यमुना चुप रही।

सब-इन्स्पेक्टर ने कहा, 'यह स्वीकार करती है। इसे हिरासत में ले लो।'

यमुना कुछ न बोली। तमाशा देखने वालों का थोड़े समय के लिए मन बहलाव हो गया।

'तब आप यह नहीं मानते कि संसार में मानसिक दुख से पीड़ित प्राणियों को इस संदेश से परिचित कराने की आवश्यकता है?'

'है, किन्तु मैं आडम्बर नहीं चाहता। व्यक्तिगत श्रद्धा से जितना जो कर सके, उतना ही पर्याप्त है।'

'किन्तु यह अब एक परिवार बन गया है, इसकी कोई निश्चित व्यवस्था करनी होगी।'

निंरजन ने यहाँ का सब समाचार लिखते हुए किशोरी को यह भी लिखा था-'अपने और उसके पाप-चिह्न विजय का जीवन नहीं के बराबर है। हम दोनों को संतोष करना चाहिए और मेरी भी यही इच्छा है कि अब भगवद्भजन करूँ। मैं भारत-संघ के संगठन में लगा हूँ, विजय को खोजकर उसे और भी संकट में डालना होगा। तुम्हारे लिए भी संतोष को छोड़कर दूसरा कोई उपाय नहीं।'

'तो अब क्या नहीं है?'

'नहीं है। मैं रोकती थी, बाबा ने न माना। एक लड़ाई में वह मारा गया। अकेले बीस सिपाहियों को उसने उलझा लिया, और सब निकल आये।'

'तो क्या मुझे आश्रय देने वाले डाकू हैं?'

'तुम देखते नहीं, मैं जानवरों को पालती हूँ, और मेरे बाबा उन्हें मेले में ले जाकर बेचते हैं।' गाला का स्वर तीव्र और सन्देहजनक था।

'और तुम्हारी माँ?'

सोमदेव चला गया, और मिरजा एकान्त में जीवन की गुत्थियों को सुलझाने लगे। वापी के मरकत जल को निर्निमेष देखते हुए वे संगमर्मर के उसी प्रकोष्ठ के सामने निश्चेष्ट थे, जिसमें बैठे थे।

नूपुर की झनकार ने स्वप्न भंग कर दिया-'देखो तो इसे हो क्या गया है, बोलता नहीं क्यों! तुम चाहो तो यह बोल दे।'

'ऐं! इसका पिंजड़ा तो तुमने सोने से लाद दिया है, मलका! बहुत हो जाने पर भी सोना सोना ही है! ऐसा दुरुपयोग!'

'तुम इसे देखो तो, क्यों दुखी है?'

'ले जाओ, जब मैं अपने जीवन के प्रश्नों पर विचार कर रहा हूँ, तब तुम यह खिलवाड़ दिखाकर मुझे भुलवाना चाहती हो!'

'वह भी तो दुलार करता है। बेचारा जो कुछ पाता है, वही तो देता है, फिर इसमें उलाहना कैसा, गाला!'

'जो पावै उसे बाँट दे।' गाला ने गम्भीर होकर कहा।

'यही तो उदारता है! कहो आज तो तुमने साड़ी पहन ही ली, बहुत भली लगती हो।'

'बाबा बहुत बिगड़े हैं, आज तीन दिन हुए, मुझसे बोले नहीं। नये! तुमको स्मरण होगा कि मेरा पढ़ना-लिखना जानकर तुम्हीं ने एक दिन कहा था कि तुम अनायास ही जंगल में शिक्षा का प्रचार करती हो-भूल तो नहीं गये?'

'चलूँगा।' चुप होते हुए मोहन ने कहा।

मोहन के मन में पगली से दूर रहने की बड़ी इच्छा थी। श्रीचन्द्र ने पण्डा को कुछ रुपये दिये कि पगली का कुछ उचित प्रबन्ध कर दिया जाय और बोले, 'चाची, मैं मोहन को गाड़ी दिलाने के लिए बाजार लिवाता जाऊँ?'

चाची ने कहा, 'हाँ-हाँ, आपका ही लड़का है।'

'मैं फिर आता हूँ, आपके पड़ोस में तो ठहरा हूँ।' कहकर श्रीचन्द्र, किशोरी और मोहन बाजार की ओर चले।

'क्षमा कर बेटी। क्षमा में भगवान की शक्ति है, उनकी अनुकम्पा है। मैंने अपराध किया था, उसी का तो फल भोग रहा हूँ। यदि तू सचमुच वही गोविन्दी चौबाइन की पाली हुई पगली है, तो तू प्रसन्न हो जा-अपने अभिशाप ही ज्वाला में मुझे जलता हुआ देखकर प्रसन्न हो जा! बेटी, हरद्वार तक तो तेरी माँ का पता था, पर मैं बहुत दिनों से नहीं जानता कि वह अब कहाँ है। नन्दो कहाँ है यह बताने में अब अन्धा रामदेव असमर्थ है बेटी।'

चाची ने उठकर सहसा उस अन्धे का हाथ पकड़कर कहा, 'रामदेव!'

'तुमको सब किस नाम से पुकारते थे, यह तो मैंने आज तक न पूछा। बताओ बेटी वह प्यारा नाम।'

'माँ, मुझे चौबाइन 'घण्टी' नाम से पुकारती थी।'

'चाँदी की सुरीली घण्टी-सी ही तेरी बोली है बेटी।'

किशोरी सुन रही थी। उसने पास आकर एक बार आँख गड़ाकर देखा और पूछा, 'क्या कहा-घण्टी?'

'हाँ बाबूजी! वही वृदांवन वाली घण्टी!'

किशोरी आग हो गयी। वह भभक उठी, 'निकल जा डायन! मेरे विजय को खा डालने वाली चुड़ैल।'

नन्दो तो पहले एक बार किशोरी की डाँट पर स्तब्ध रही; पर वह कब सहने वाली! उसने कहा, 'मुँह सम्भालकर बात करो बहू। मैं किसी से दबने वाली नहीं। मेरे सामने किसका साहस है, जो मेरी बेटी, मेरी घण्टी को आँख दिखलावे! आँख निकाल लूँ!'

'तुम दोनों अभी निकल जाओ-अभी जाओ, नहीं तो नौकरों से धक्के देकर निकलवा दूँगी।' हाँफते हुई किशोरी ने कहा।

'बस इतना ही तो-गौरी रूठे अपना सुहाग ले! हम लोग जाती हैं, मेरे रुपये अभी दिलवा दो!' बस एक शब्द भी मुँह से न निकालना-समझी!'

नन्दो ने तीखेपन से कहा।

'तुमने कई दिन लगा दिये, मैं तो अब सोने जा रही थी।'

'क्या करूँ, आश्रम की एक स्त्री पर हत्या का भयानक अभियोग था। गुरुदेव ने उसकी सहायता के लिए बुलाया था।'

'तुम्हारा आश्रम हत्यारों की भी सहायता करता है?'

'नहीं गाला! वह हत्या उसने नहीं की थी, वस्तुतः एक दूसरे पुरुष ने की; पर वह स्त्री उसे बचाना चाहती है।'

'क्यों?'

'यही तो मैं समझ न सका।'

'तुम न समझ सके! स्त्री एक पुरुष को फाँसी से बचाना चाहती है और इसका कारण तुम्हारी समझ में न आया-इतना स्पष्ट कारण!'

'तुम क्या समझती हो?'

'स्त्री जिससे प्रेम करती है, उसी पर सरबस वार देने को प्रस्तुत हो जाती है, यदि वह भी उसका प्रेमी हो तो स्त्री वय के हिसाब से सदैव शिशु, कर्म में वयस्क और अपनी सहायता में निरीह है। विधाता का ऐसा ही विधान है।'

गाला चिन्तित मंगल का मुँह देख रही थी। वह हँस पड़ी। बोला, 'कहाँ घूम रहे हो मंगल?'

मंगल चौंक उठा। उसने देखा, जिसे खोजता था वही कब से मुझे पुकार रहा है। वह तुरन्त बोला, 'कहीं तो नहीं, गाला!'

आज पहला अवसर था, गाला ने मंगल को उसके नाम से पुकारा। उसमें सरलता थी, हृदय की छाया थी। मंगल ने अभिन्नता का अनुभव किया। हँस पड़ा।

'तुम कुछ सोच रहे थे। यही कि स्त्रियाँ ऐसा प्रेम कर सकती हैं तर्क ने कहा होगा-नहीं! व्यवहार ने समझाया होगा, यह सब स्वप्न है! यही न। पर मैं कहती हूँ सब सत्य है, स्त्री का हृदय...प्रेम का रंगमंच है! तुमने शास्त्र पढ़ा है, फिर भी तुम स्त्रियों के हृदय को परखने में उतने कुशल नहीं हो, क्योंकि...'

बीच में रोककर मंगल ने पूछा, 'और तुम कैसे प्रेम का रहस्य जानती हो गाला! तुम भी तो...'

। नन्दो ने डपटकर कहा, 'तू कौन है रे! क्या सरकारी राज नहीं रहा! आगे बढ़ा तो ऐसा झापड़ लगेगा कि तेरा टोप उड़ जायेगा।'

दो-चार मनुष्य और इकट्ठे हो गये। बाथम ने कहा, 'माँ जी, यह मेरी विवाहिता स्त्री है, यह ईसाई है, आप नहीं जानतीं।'

नन्दो तो घबरा गयी और लोगों के भी कान सुगबुगाये; पर सहसा फिर मंगल बाथम के सामने डट गया। उसने घण्टी से पूछा, 'क्या तुम ईसाई-धर्म ग्रहण कर चुकी हो?'

'मैं धर्म-कर्म कुछ नहीं जानती। मेरा कोई आश्रय न था, तो इन्होंने मुझे कई दिन खाने को दिया था।'

'ठीक है; पर तुमने इसके साथ ब्याह किया था?'

'नहीं, यह मुझे दो-एक दिन गिरजाघर में ले गये थे, ब्याह-व्याह मैं नहीं जानती।'

'मिस्टर बाथम, वह क्या कहती है क्या आप लोगों का ब्याह चर्च में नियमानुसार हो चुका है-आप प्रमाण दे सकते हैं?'

'नहीं, जिस दिन होने वाला था, उसी दिन तो यह भागी। हाँ, यह बपतिस्मा अवश्य ले चुकी है।'

'तुम हो! मैं तो चौंक उठी थी, भला तुम इस समय क्यों आये?'

'तुम्हारे पिता कुछ घण्टों के लिए संसार में जीवित हैं, यदि चाहो तो देख सकती हो!'

'क्या सच! तो मैं चलती हूँ।' कहकर गाला ने सलाई जलाकर आलोक किया। वह एक चिट पर कुछ लिखकर पंडितजी के कम्बल के पास गयी। वे अभी सो रहे थे; गाला चिट उनके सिरहाने रखकर नये के पास गयी, दोनों टेकरी से उतरकर सड़क पर चलने लगे।

नये कहने लगा-

'हाँ पाठशाला भी सूनी है-मंगलदेव वृन्दावन की एक हत्या में फँसी हुई यमुना नाम की एक स्त्री के अभियोग की देख-रेख में गये हैं, उन्हें अभी कई दिन लगेंगे।'

बीच में टोककर नये ने पूछा, 'क्या कहा, यमुना> वह हत्या में फँसी है?'

'हाँ, पर तुम क्यों पूछते हो?'

'मैं भी हत्यारा हूँ गाला, इसी से पूछता हूँ, फैसला किस दिन होगा कब तक मंगलदेव आएँगे?'

'परसों न्याय का दिन नियत है।' गाला ने कहा।

'तो चलो, आज ही तुम्हें पाठशाला पहुँचा दूँ। अब यहाँ रहना ठीक भी नहीं है।'

'अच्छी बात है। वह सन्दूक लेते आओ।'

सरला ने देखा-एक व्यक्ति कम्बल ओढ़े, यमुना की ओर मुँह किये बैठा है; जैसे किसी योगी की अचल समाधि लगी है।

सरला कहने लगी, 'हे यमुना माता! मंगल का कल्याण करो और उसे जीवित करके गाला को भी प्राणदान दो! माता, आज की रात बड़ी भयानक है-दुहाई भगवान की।'

वह बैठा हुआ कम्बल वाला विचलित हो उठा। उसने बड़े गम्भीर स्वर में पूछा, 'क्या मंगलदेव रुग्ण हैं?'

प्रार्थिनी और व्याकुल सरला ने कहा, 'हाँ महाराज, यह किसी का बच्चा है, उसके स्नेह का धन है, उसी की कल्याण-कामना कर रही हूँ।'

'और तुम्हारा नाम सरला है। तुम ईसाई के घर पहले रहती थीं न?' धीरे स्वर से प्रश्न हुआ।

'हाँ योगिराज! आप तो अन्तर्यामी हैं।'

उस व्यक्ति ने टटोलकर कोई वस्तु निकालकर सरला की ओर फेंक दी। सरला ने देखा, वह एक यंत्र है। उसने कहा, 'बड़ी दया महाराज! तो इसे ले जाकर बाँध दूँगी न

वह फिर कुछ न बोला, जैसे समाधि लग गयी हो, सरला ने अधिक छेड़ना उचित न समझा। मन-ही-मन नमस्कार करती हुई प्रसन्नता से आश्रम की ओर लौट पड़ी।

सरला ने गाला के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, 'बेटी! तेरे भाग्य से आज मुझे मेरा खोया हुआ धन मिल गया!'

गाला गड़ी जा रही थी।

मंगल एक आनन्दप्रद कुतूहल से पुलकित हो उठा। उसने सरला के पैर पकड़कर कहा, 'मुझे तुमने क्यों छोड़ दिया था माँ

उसकी भावनाओं की सीमा न थी। कभी वह जीवन-भर के हिसाब को बराबर हुआ समझता, कभी उसे भान होता कि आज के संसार में मेरा जीवन प्रारम्भ हुआ है।

सरला ने कहा, 'मैं कितनी आशा में थी, यह तुम क्या जानोगे। तुमने तो अपनी माता के जीवित रहने की कल्पना भी न की होगी। पर भगवान की दया पर मेरा विश्वास था और उसने मेरी लाज रख ली।'

मंगलदेव ने कहना आरम्भ किया-

'संसार मैं जितनी हलचल है, आन्दोलन हैं, वे सब मानवता की पुकार हैं। जननी अपने झगड़ालू कुटुम्ब में मेल कराने के लिए बुला रही है। उसके लिए हमें प्रस्तुत होना है। हम अलग न खड़े रहेंगे। यह समारोह उसी का समारम्भ है। इसलिए हमारे आन्दोलन व्यच्छेदक न हों।

'किशोरी,

संसार इतना कठोर है कि वह क्षमा करना नहीं जानता और उसका सबसे बड़ा दंड है 'आत्म दर्शन!' अपनी दुर्बलता जब अपराधी की स्मृति बनकर डंक मारती है, तब उसे कितना उत्पीड़ामय होना पड़ता है। उसे तुम्हें क्या समझाऊँ, मेरा अनुमान है कि तुम भी उसे भोगकर जान सकी हो।

मनुष्य के पास तर्कों के समर्थन का अस्त्र है; पर कठोर सत्य अलग खड़ा उसकी विद्वत्तापूर्ण मूर्खता पर मुस्करा देता है। यह हँसी शूल-सी भयानक, ज्वाला से भी अधिक झुलसाने वाली होती है।

एक घण्टा बीता न होगा कि एक स्त्री आयी, उसने कहा, 'भाई!' 'बहन!' कहकर विजय उठ बैठा। उस स्त्री ने कुछ रोटियाँ उसके हाथ पर रख दीं। विजय खाने लगा। स्त्री ने कहा, 'मेरी नौकरी लग गयी भाई! अब तुम भूखे न रहोगे।'

'कहाँ बहन दूसरी रोटी समाप्त करते हुए विजय ने पूछा।

'श्रीचन्द्र के यहाँ।'

विजय के हाथ से रोटी गिर पड़ी। उसने कहा, 'तुमने आज मेरे साथ बड़ा अन्याय किया बहन!'

'क्षमा करो भाई! तुम्हारी माँ मरण-सेज पर है, तुम उन्हें एक बार देखोगे?'

विजय चुप था। उसके सामने ब्रह्मांड घूमने लगा। उसने कहा, 'माँ मरण-सेज पर! देखूँगा यमुना परन्तु तुमने...!'

'मैं दुर्बल हूँ भाई! नारी-हृदय दुर्बल है, मैं अपने को रोक न सकी। मुझे नौकरी दूसरी जगह मिल सकती थी; पर तुम न जानते होगे कि श्रीचन्द्र का दत्तक पुत्र मोहन का मेरी कोख से जन्म हुआ है।'

'क्या?'

'हाँ भाई! तुम्हारी बहन यमुना का रक्त है, उसकी कथा फिर सुनाऊँगी।'

'बहन! तुमने मुझे बचा लिया। अब मैं मोहन की रोटी सुख से खा सकूँगा।

पर माँ मरण-सेज पर... तो मैं चलूँ, कोई घुसने न दे तब!'

स्वंयसेवकों ने पूछा, 'यही न देवीजी?'

'हाँ।' कहकर घण्टी ने देखा कि एक स्त्री घूँघट काढ़े, दस रुपये का नोट स्वयंसेवक के हाथ में दे रही है।

 

घण्टी ने कहा, 'दान है पुण्यभागिनी का-ले लो, जाकर इससे सामान लाकर मृतक संस्कार करवा दो।'

स्वयंसेवक ने उसे ले लिया। वह स्त्री बैठी थी। इतने में मंगलदेव के साथ गाला भी आयी। मंगल ने कहा, 'घण्टी! मैं तुम्हारी इस तत्परता से बड़ा प्रसन्न हुआ। अच्छा अब बोलो, अभी बहुत-सा काम बाकी है।'

'मनुष्य के हिसाब-किताब में काम ही तो बाकी पड़े मिलते हैं।' कहकर घण्टी सोचने लगी। फिर उस शव की दीन-दशा मंगल को संकेत से दिखलायी।

मंगल ने देखा एक स्त्री पास ही मलिन वसन में बैठी है। उसका घूँघट आँसुओं से भींग गया है और निराश्रय पड़ा है एक कंकाल!

देशकाल एवं वातावरण :-

कंकाल उस समय की कहानी है जब मथुरा ,वृन्दावन में महिलाओं को बहुत सारीसमस्याओं का सामना करना पड़ता था | आश्रमों का बोल बाला था बहुत ही मर्मस्पर्शी उपन्यास है ,अलग अलग प्रेमी जोड़ों के रूप में महिलाओं का पुरुषो के द्वारा किया गया छुपा हुआ अन्याय झलकता है | कुछ ढकोसले कुरीतियों को दिखाया है | जयशंकर प्रसाद ने बहुत ही मार्मिक तरीके से एक एक पात्र को जीवंत रूप दिया है |

 

भाषा शैली :-

उपन्यास की भाषा शैली बहुत ही सरल एवं सहज है |एक एक संवाद में जीवंत स्वरुप झलकता है ,जय शंकर प्रसाद ने बहुत ही समझ आने वाली भाषा का प्रयोग किया है | संवाद के शब्दों का चयन बहुत ही सोच समझ कर किया गया है ,उपन्यास पढ़ते हुए कहीं भी नहीं लगता की आप कहानी से भटक रहे हैं| उपन्यास के संवाद  पाठक को बांधे रखते हैं |

उद्देश्य :-

जयशंकर प्रसाद का उद्देश्य साफ़ नजर आता है की उस दौर की महिलाओं की स्थिति ,उनके हालात को पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास किया है , इस संसार में मनुष्य बहुत ही स्वार्थी एवं निर्दयी है खासकर महिलाओं के प्रति पुरुषों का  व्यवहार| जो अपने स्वार्थ को पूरा करने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है ,महिलाएं भी अपनी इच्छाओं की पूर्ती के लिए लोक लाज को ताक पर रखकर अपना स्वार्थ सिद्ध करती है |

 

 

उपन्यास समीक्षक

दीपक कुमार मालवीय

M.Sc. ,M.Ed.

 

 

 

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