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  उपन्यास समीक्षा “कंकाल”   शीर्षक :- जय शंकर प्रसाद द्वारा रचित यह उपन्यास “कंकाल” एक कालजयी उपन्यास है, जो इसके शीर्षक “कंकाल’   को बहुत ही सार्थक रूप में सटीक स्पष्ट करता है | उपन्यास में इस शीर्षक के अंत में इसका शीर्षक कंकाल दिए जाने का पता चलता है | जब इस उपन्यास को पढना प्रारंभ करते हैं तो एक के बाद एक चरित्र आपके सामने आकर आपको बांधे रखते हैं ,जब तक आप इस को पूरा न पढ़ लें तब तक इस शीर्षक “कंकाल” का अर्थ नहीं समझ पाएंगे | कथावस्तु :- प्रयाग में एक व्यापारी श्रीचंद एवं उसकी पत्नी किशोरी संतान की इच्छा लिए एक महात्मा से मिलने आते हैं, महात्मा किशोरी को देखकर अचम्भित हो   जाता है और अपने को सँभालते हुए वहां से हरिद्वार चला जाता है यहाँ पर भी किशोरी आ जाती है जो कोई और नहीं वरन उसकी बचपन की सखी है ,महात्मा उसे अपना परिचय देते हुए बताता है कि वह उसका बचपन का साथी रंजन है और अब वह निरंजन हो गया है | किशोरी को वही पर छोड़ कर उसका पति उसे छोड़कर व्यापार को निकल जाता है यहाँ पर किशोरी के साथ उसका नौकर बलदा...